Thursday, October 7, 2010

कुछ कदम आवारगी

क्या  बताये  क्यों  कभी  कब  कहा  किस  दौर  मे
चल  पड़े  कुछ  कदम  आवारगी  थे  वो  कुछ  गुमनाम  जो
देख  के  ये  बेखुदी  हर दिल  संग अजब  का  ढंग वो 
कर  गुजरते  हदों  से  जो  फिर  भी   जी  पाए  न  खुद  को  क्यों
बना  देते  है  मक़ाम  कोई  खुद  की  फितरत  का  न  इल्म  कोई
लुटाते  है  खुद  को  मसक  यो  तरसते  ओह  भी  होंगे  कुछ  प्यार  को
चलते  कदम  न  थकते  जिनके  आज  वोह  पत्थर  से है  बेजान  क्यों
चल  निकल  चल  उस आवारगी  पे  फिर  क्यों  जहा  कोई  सरहद  न  हो
न  हो  ये  झूठे  साथ  संग  न  कोई  बेदर्द  दर्दो  गम
इंसानियत  की  आब  हो  जहा , बन्दों  मे  ही  खुदा  की  पहचान  हो
जात  न  मुल्क  न  मजहब  कोई  न  जन्नत  न  दोजख  का  भरम  कोई
प्यार  की  बोली  समझे  सभी  नफरतो  का  दौर  न  छू  पाए  कभी
क्या  मेरा  क्या  तेरा  करना  मिल  बाट  के  सब  जी  ले  जहा
इसी  जहा  के आगाज़  में  निकले  होंगे  हर दौर  मे कुछ  कदम  आवारगी 

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