क्या बताये क्यों कभी कब कहा किस दौर मे
चल पड़े कुछ कदम आवारगी थे वो कुछ गुमनाम जो
देख के ये बेखुदी हर दिल संग अजब का ढंग वो
कर गुजरते हदों से जो फिर भी जी पाए न खुद को क्यों
बना देते है मक़ाम कोई खुद की फितरत का न इल्म कोई
लुटाते है खुद को मसक यो तरसते ओह भी होंगे कुछ प्यार को
चलते कदम न थकते जिनके आज वोह पत्थर से है बेजान क्यों
चल निकल चल उस आवारगी पे फिर क्यों जहा कोई सरहद न हो
न हो ये झूठे साथ संग न कोई बेदर्द दर्दो गम
इंसानियत की आब हो जहा , बन्दों मे ही खुदा की पहचान हो
जात न मुल्क न मजहब कोई न जन्नत न दोजख का भरम कोई
प्यार की बोली समझे सभी नफरतो का दौर न छू पाए कभी
क्या मेरा क्या तेरा करना मिल बाट के सब जी ले जहा
इसी जहा के आगाज़ में निकले होंगे हर दौर मे कुछ कदम आवारगी
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