Friday, October 9, 2009

यही तड़प सी है

जलता हु मै दिन रात अब तो यही बस तड़प सी है
कौन जाने दिल है या की बस जमाते गमगीन नीला .
लगता नही अब कुछ और जीना सा अब तो बस दिन गीनते है
मरते रहे मरनेवालों अब तो ..न जाने जीने की अदा क्या है ...
बहुत सोचा की तेरे कुचे को रुख करे हम ..
जन्नत में भी हमे दोज़ख का असर लगता है
इबादत कहा अब बस कर गुजरता हु हर दिल की कही अब तो .
समझे अब न की तब बुरा भी क्या कम भला सा है ..
खाएइशो में दब के जीना कैसा या की तेरी तलब ऐसी
जो गुजर न पाए हर हद से वो लगता बी क्या जुनू सा है
मौत से बढकर के है वो जो .. दर्द खामोस क्यो तन्हाई की है
और उशमे सराबोर से हम बचा यही फलसफा सा है ...
अब उब चुके है झूठे यादो फरियादों से ..
बाकि बचा अब कुछ बस अपनों में गैरों के सिवा
जो चंद पल आ के भर ले काफिर को बाहों में ज़रा ..
वही लगता है अब मुझे कुछ अपना सा है ..

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